Sunday, 3 September 2017

वही मक्कार होता है।

 
अजब है मुल्क यह सारा सदा लाचार रोता है।
यहाँ तो भेषधारी भी बहुत बीमार होता है।


यहाँ हों बंदिशें दिल पर वहाँ कब चैन मिलता है,
किनारे पर खड़ा मानुष सदा बेकार होता है।


सुलगती ज़िन्दगी में तो उलझती रात है काली,
वहाँ ख़ुद से मिले कोई तभी स्वीकार होता है।


ज़माना है बड़ा जालिम ज़रा निकलो तरीके से,
यहाँ खुदगर्ज बैठे हैं यहाँ हर वार होता है।


तुझे अपना समझ कर ही पुकारा है नशेमन में,
ज़रा सा पास भी बैठो यही तो प्यार होता है।


अँधेरे में सभी बैठे यहाँ मत रौशनी करना,
यहाँ उपदेश देता जो वही मक्कार होता है।


🌺अरविंद

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