Sunday, 22 January 2017

घनाक्षरी छंद




गली गली गूँजें शोर, दिखे नहीं ओर छोर,
खिल खिल गई अब, कली कली मन की।
फिर से चुनाव आये, नेताओं के मन भाये,
हुई पूछ फिर से है, आज जन जन की।
छुटभय्ये नेता जी भी, मजमा लगाने लगे,
गणना करे है देखो, वोट रूपी धन की।
चरण पकड़ लगी, होने अब मनुहार,
तज डाली अब सारी, बात अनबन की।।

निकट बसंत सखी, मन में उमंग जगी,
भँवरे लो आ गए हैं, चूमने कली कली।
दिखने लगी है चहुँ, ओर अब हरियाली,
खिलने लगे है फूल, देखिये गली गली।
ननदिया का संदेसा, मिला जबसे है मोहे,
पिहरवा छोड़ मैं तो, सासरे चली चली।
तन मन में मदन, अगन लगाने लगे,
सुरतिया पिया तौरी, लागे है भली भली।।



गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

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