Saturday, 28 May 2016

तीन दोहा मुक्तक

 
नीर-क्षीर सी प्रीति हो, दोनों हो समभाव,
स्वार्थ खटाई के पड़े, पैदा हो बिलगाव,
चार दिनों की जिंदगी, कहते वेद पुराण,
दो दिन जाय समेटते, दो दिन का बिखराव
।।1।।


नीर-पंक से विलग वो, यद्यपि जन्में माँझ, 
अचल अमल मन कमल बन, होने आई साँझ,
चेहरे की आभा रहे, तन पर बरसे नूर,
श्वाँस वास हरि-भजन हों, बजे मँजीरा झाँझ।।2।। 


वृक्षारोपण कर जरा, पाटे मत तालाब,
तन मन झुलसेगें सभी, बचा नाहीं जो आब,
नदियाँ घटती जा रहीं, जल पहुँचा पाताल,
कुदरत से मत खेल तू, स्वारथ अपने दाब।।3।। 


*** गोप कुमार मिश्र

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