Sunday, 29 November 2015

एक चित्र मुक्तक




रहता था गुलजार चमन जो, वीरानी क्यों शाम हो गई,
पदचिन्हों से है परिलक्षित, रौनक आज तमाम हो गई,
उपवन भी क्या सच से वाकिफ, कब लौटे हैं जाने वाले,
संध्याकाल और नीरवता, जीवन का अंजाम हो गई।


**हरिओम श्रीवास्तव**

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मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...