Sunday, 21 June 2015

घर की मुर्गी दाल बराबर पर दोहे





होती जब उपलब्धता, सतत और आसान
तब मुश्किल सी चीज भी, लगती दाल समान।।1।।

गजगामिन मृगलोचनी, सभी गुणों की खान
नित-नित घर में देखकर, समझें दाल समान।।2।।

बीबी के बिन एक दिन, लगता जैसे साल
फिर भी उनको ही कहें, घर की मुर्गी दाल।।3।।

घर बाहर जो देख लें, चिकनी चुपड़ी खाल
तब उनको लगने लगे, घर की मुर्गी दाल।।4।।

बाहर उनका रौब है, फिर भी एक मलाल
पत्नी उनको समझतीं, मुर्गी या फिर दाल।।5।।

बड़े दाल के भाव ने, किया हाल बेहाल
मुर्गी सस्ती हो गई, मँहगी है अब दाल।।6।। 

***हरिओम श्रीवास्तव***

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