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सौंदर्य - एक कवि का सच
तुम शब्दों से परे हो फिर भी हर कवि तुम्हारा उपयोग करना चाहता है। मानो, वह हवा को मुट्ठी में क़ैद कर लेने पर आमादा हो, मानो, आकाश को आँखों ...
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पिघला सूर्य , गरम सुनहरी; धूप की नदी। बरसी धूप, नदी पोखर कूप; भाप स्वरूप। जंगल काटे, चिमनियाँ उगायीं; छलनी धरा। दही ...
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सिर शोभित हेम किरीट गजानन मूषक वाहन प्रेम करे। उपवीत मनोहर कंध पड़ा अरु मोदक के कर थाल धरे। फल में प्रिय जामुन कैथ लगें उर पाटल फूल...

वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह क्या बात है सपन जी भाई साहब... बहुत ही सुन्दर ढंग से देश प्रेम के भावों को आपने यहाँ पंक्तिबद्ध किये हैं... बधाई आपको... सादर वंदे...
ReplyDeleteसुरेन्द्र नवल जी,
Deleteबहुत-बहुत आभार आपका ... आपके शब्द प्रेरित करते हैं ...
सादर नमन