Sunday, 4 August 2024

मन के मनके दोहरे

 

संग सजीले स्वप्न से, रूप सँजोये प्रीत।
चाह यही सदियों रहे, संग तुम्हारा मीत।।
ये मँडराते पुष्प पर, मधुरस के मजमून।
सुख अनंत मिलते जहाँ, खुशियाँ होती दून।।
मन की दुविधा सब कटे, करके उनसे बात।
मावस की हो वेदना, बने उजाली रात।।
बंद लिफाफे ज्यों खुशी, बँधी रहे उम्मीद।
खुले हृदय के द्वार 'दो', करिए उसके दीद।।
जगत रीति घन साधना, जीवन है संघर्ष।
मीत मिले मन भावना, सुख-दुख बाँटे हर्ष।।
कृष्ण-सुदामा से मिले, नीर नयन असहाय।
सरल प्रेम निष्काम हो, लिखा गया अध्याय।।
राधा-मीरा की लगन, श्याम सघन संगीत।
रोम-रोम गाए ‘लता’, ऐसा हो मन मीत।।

*** डॉ. प्रेमलता त्रिपाठी

No comments:

Post a Comment

तमस हटाता नित्य सवेरा - गीत

  जीवन के इस महा समर में, सुख-दुख ने मानव को घेरा। नीरसता क्यों मन में लाना, तमस हटाता नित्य सवेरा।।   पतझड़ का मौसम जाने पर, बासंती मौ...