Sunday, 4 December 2016

धन/संपत्ति पर दोहे


धन दौलत पर तू नहीं, बैठ कुंडली मार।
पानी ये ठहरा हुआ, होगा बदबूदार।।


आपा-धापी को उडें, हंस भेष में बाज।
सकल सृष्टि धन लूट लूँ, चाह मनुज की आज।।


अर्थ और बस काम को, भोग धर्म के साथ।
सर पर सदा बना रहे, नारायण का हाथ।।


तीन गती धन की कही, श्रेष्ठ प्रथम है दान।
मध्यम भोग विलास है, अंतिम ख़ाक समान।।


दौलत वाले कब हुए, दिल से मालामाल।
दिल से हो धनवान तो, चाकर है "गोपाल"।।


***** आर. सी. शर्मा "गोपाल"

No comments:

Post a Comment

मन-मयूर मुस्काए - एक गीत

  उमड़-घुमड़ घन छाए नभ में, बूंदन प्रीत-जगाए। पंख पसारे झूमे गाए, मन-मयूर मुस्काए। सौंधी-सौंधी महक चतुर्दिक, ऊर्वर करती अंचल। ...