Sunday, 9 August 2015
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प्रेम बिना सब सूना - एक गीत
प्रेम बिना सब सूना है जग, प्रेम तत्त्व है सार। प्रेम बिना सब रिश्ते बन्धन, लगता जीवन खार। भाव-भूमि का मधुरिम अंकन, रचता नव आह्ला...
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मानव (१) मैं भी मानव हूँ। एहसास इसका, इसलिए नहीं होता, कि परिभाषा के अनुकूल मैं भी हूँ। बल्कि, इसलिए होता है क्योंकि मैं भी बे...
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जब उजड़ा फूलों का मेला। ओ पलाश! तू खिला अकेला।। शीतल मंद समीर चली तो , जल-थल क्या नभ भी बौराये , शाख़ों के श्रृंगों पर चंचल , कुसुम-...

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