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ब्रह्म का स्वरूप माँ
सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ। जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ। दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती। कण्ठ से लगा कभी मम...
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पिघला सूर्य , गरम सुनहरी; धूप की नदी। बरसी धूप, नदी पोखर कूप; भाप स्वरूप। जंगल काटे, चिमनियाँ उगायीं; छलनी धरा। दही ...
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जब उजड़ा फूलों का मेला। ओ पलाश! तू खिला अकेला।। शीतल मंद समीर चली तो , जल-थल क्या नभ भी बौराये , शाख़ों के श्रृंगों पर चंचल , कुसुम-...

वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह क्या बात है सपन जी भाई साहब बहुत ही कोमल और पावन भावों को आपने इन दोहों में सजाया है... यह सच है कि प्रभु स्मरण से ही सब संकटों और सब दुखों से हम दूर रह सकते हैं इसलिए हमें हर पल प्रभु का स्मरण करना चाहिए... बधाई आपको भाई साहब... सादर वंदे...
ReplyDeleteआपका हृदय से बहुत-बहुत आभार नवल जी। प्रभु में मन रम जाए तो इससे अच्छा क्या होगा। मन के भावों को प्रभु के समीप लाना ही उद्देश्य है। इस सुन्दर सराहना के लिए आपका दिल से आभार। सादर नमन।
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