Sunday, 10 December 2017

प्रेम होना चाहिए




धन नहीं धरती नहीं मुझको न सोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

स्वार्थ का है काम क्या इस प्रेम के संसार में
त्याग की ईंटें लगी हों प्रीत के आधार में
प्रेम से संसार का हर दीप्त कोना चाहिए 
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

प्रेम का उत्तर घृणा हो यह नहीं समुचित कभी
प्रेम के पथ पर गमन होता नहीं अनुचित कभी 
प्रेम वितरण अवसरों को नित सँजोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

प्रेम में है कौन जीता व्यर्थ है यह प्रश्न भी
प्रेम में हारा वही उसका मनाता जश्न भी
हार का मन पर न कोई बोझ ढोना चाहिए
हर हृदय में सिर्फ सच्चा प्रेम होना चाहिए

गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत' बीकानेरी

No comments:

Post a Comment

ब्रह्म का स्वरूप माँ

  सौम्य प्रेम,शील,क्षेम का विशुद्ध रूप माँ। जीव तत्व में विभक्त ब्रह्म का स्वरूप माँ। दण्ड दे दुलारती, भविष्य को सँवारती। कण्ठ से लगा कभी मम...